सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ने पर वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर का दर्द छलक पड़ा

नरेंद्र मोदी सरकार ने लोकसभा और राज्यसभा सांसदों के वेतन, पेंशन और भत्तों में 1 अप्रैल 2023 से बढ़ोतरी कर दी है। सांसदों का वेतन एक लाख रुपये से बढ़कर अब 1.24 लाख प्रति माह हो गया है। वहीं सांसदों को मिलने वाले दैनिक भत्तों की रकम को भी 2 हजार रुपये से बढ़ाकर ढाई हजार रुपये कर दिया गया है। पेंशन की राशि को भी 25 हजार से बढ़ाकर 31 हजार रुपये कर दिया गया है। पूर्व सांसदों को सेवा के प्रत्येक वर्ष के लिए मिलने वाले अतिरिक्त पेंशन को भी 2 हजार रुपये से बढ़ाकर 2,500 रुपये कर दिया गया है।

सरकार ने सांसदों के वेतन, भत्ते और पेंशन में बढ़ोतरी का यह फैसला संसद के बजट सत्र के दौरान ही करके,सभी सांसदों को खुश करने का प्रयास किया है।

लेकिन सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ाए जाने की खबर सामने आने के साथ ही देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार और पदमश्री से सम्मानित सुरेंद्र किशोर का दर्द छलक कर सामने आ गया। उन्होंने सरकार की पेंशन नीति पर बड़ा सवाल खड़ा करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि वर्ष 2005 में उनकी EPF पेंशन राशि 1231 रुपये तय की गई थी और आज यानी वर्ष 2025 में भी उन्हें 1231 रुपये महीने ही मिल रहा है।

पदमश्री से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर की कलम से निकला दर्द ( Facebook Post)

भारत की एक अनोखी पेंशन योजना
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राशि दुनिया में सबसे कम।फिर भी
बढ़ोत्तरी का कोई प्रावधान ही नहीं।
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सुरेंद्र किशोर
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लघुत्तम राशि तय करने के लिए ई.पी.एफ.पेंशन
योजना का नाम गिन्नीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में
अब तक दर्ज हुआ है या नहीं ?!
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कोई मेरा ज्ञानवर्धन करे !
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यदि नहीं हुआ है तो यह तो
भारत के साथ भारी अन्याय है।
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आम आदमी बनाम खास आदमी
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खास आदमी
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सन 1976 में पूर्व सांसदों के लिए 300 रुपए
मासिक पेंशन शुरू की गई थी।
अब वह बढ़कर 31 हजार रुपए मासिक हो चुकी है।
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आम आदमी
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सन 2005 में मेरी ई.पी.एफ.पेंशन राशि तय हुई।
जितनी राशि मुझे हर माह 2005 में मिलती थी,
उतनी ही राशि, एक पैसा भी कम नहीं ,
यानी, 1231 रुपए रिपीट 1231 रुपए आज
भी हर माह मिल रही है।
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मैं भारत सरकार का शुक्रगुजार हूं कि उसने भले वृद्धि न की हो,पर मेरी पेंशन राशि में से एक पैसे की भी कटौती नहीं की है।

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किसी अनोखी पेंशन योजना में कटौती का अनोखा कदम तो उठाया ही जा सकता था ! मूल्य वृद्धि के साथ रुपए की कीमत में पिछले 20 साल में जितनी भी छीजन हुई है,उसके लिए बेचारी सरकार भला क्या कर सकती है ?
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मुझे इस बात पर आश्चर्य जरूर है कि इतनी कम पेंशन राशि, यानी दुनिया की लघुत्तम पेंशन राशि , देने के लिए, जिसमें बढ़ोत्तरी का भी कोई प्रावधान न हो , गिन्नीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकाॅर्ड में भारत सरकार का खासकर तब के प्रधानमंत्री पी.वी.नरसिंह राव और वित्त मंत्री मनमोहन सिंह का नाम अब तक दर्ज क्यों नहीं हुआ ?
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इधर आम आदमी, यानी मेरी क्या !
यहां तो है–रोज कमाओ,रोज खाओ !
जिस अखबार के लिए मैं अक्सर लिखता हूं,उसने कृपा करके बिना मांगे मेरे एक लेख का पारिश्रमिक
2 हजार से बढ़ाकर तीन हजार रुपए कर ही दिया है।
जब पद्मश्री अवार्डी दर्शनम् मुगलैया हैदराबाद की निर्माण कंपनी में मजूदर का काम कर सकता है तो मैं तो आदतन पत्रकार हूं।मुझे तो घर में ही बैठकर काम करना है।

भले नियमित सेवा से अवकाश ग्रहण करने के 20 साल बाद तक भी काम ही काम। जब तक मेरी अंगुलियां कम्प्यूटर के की -बोर्ड पर चलने लायक स्वस्थ रहेंगी, तब तक तो मैं लिखता ही रहूंगा।और, लिखूंगा तो कुछ न कुछ तो पत्रमं पुष्पम् मिलते ही रहेंगेे।उससे पीठ से पेट की दूरी बनी ही रहेगी।
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गौरवशाली दिव्य भारतीय परंपरा का पालन करते हुए पेट को पीठ से अलग बनाये रखने में मेरी भारी सफलता के लिए कोई मुझे धन्यवाद और बधाई क्यों नहीं देता ?! वैसे इस मामले में मैं अकेला नहीं हूं।यह लाखों ई.पी.एफ.पेंशन धारियों की प्रतिनिधि आवाज है।
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24 मार्च 25

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