बेलगाम फीस की वसूली- प्राइवेट स्कूलों की मनमानी पर लगाम कब लगेगी ?

दिल्ली में प्राइवेट स्कूलों की मनमानी से जनता त्रस्त हो गई है। सरकार बदलने के साथ ही प्राइवेट स्कूलों ने 10 प्रतिशत से लेकर 30 प्रतिशत तक फीस बढ़ाकर अभिवावकों की कमर तोड़ दी है। दिल्ली के ज्यादातर प्राइवेट स्कूल मनमाने दामों पर किताबें और स्कूल ड्रेस भी खरीदने को मजबूर कर रहे हैं। ऐसे में सवाल तो यही उठ रहा है कि सरकार प्राइवेट स्कूलों की लॉबी के आगे क्यों झुकी हुई है ? इन स्कूलों के खातों की सालाना ऑडिट क्यों नहीं करवा रही है ? हालांकि यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि प्राइवेट स्कूलों की यह मनमानी किसी एक शहर या किसी एक राज्य तक ही सीमित भर नहीं है। वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक संतोष कुमार पाठक का यह लेख पढ़िए...

By संतोष कुमार पाठक, वरिष्ठ पत्रकार

प्राइवेट स्कूलों द्वारा फीस में बेलगाम बढ़ोतरी की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। प्राइवेट स्कूलों के संचालकों में मुनाफा कमाने का लालच इस कदर बढ़ता जा रहा है कि वे सारी सीमाओं को तोड़ते जा रहे हैं। स्कूल से जबरदस्ती महंगी किताबें खरीदने के लिए मजबूर करने का मामला हो या फिर तय की गई दुकानों से ही घटिया क्वालिटी की ड्रेस ज्यादा कीमत पर खरीदने का दबाव हो, ऐसा लगता है कि इनपर कोई कानून या नियम लागू नहीं होता है।

प्राइवेट स्कूलों की लॉबी इतनी ज्यादा मजबूत हो गई है कि अब इन्हें सरकारों का भी कोई भय नहीं रहा है। शुक्रवार को दिल्ली के एक नामी-गिरामी स्कूल से ऐसी खबर आई जिसने सबको स्तब्ध कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार , दिल्ली के एक बड़े स्कूल ( DPS, द्वारका ) ने तो बच्चों को ही बंधक बना लिया था। बताया जा रहा है कि दिल्ली के डीपीएस द्वारका में फीस बढ़ोतरी को लेकर वहां पढ़ने वाले बच्चों के अभिवावक प्रदर्शन कर रहे थे और इस बीच स्कूल के प्रबंधकों ने कुछ बच्चों को लाइब्रेरी में बंधक बना लिया। एक न्यूज चैनल ने तो यहां तक दावा किया है कि बच्चों को लाइब्रेरी में बंद करने के मामले की जांच साउथ वेस्ट डीएम लक्ष्य सिंहल ने की और उन्होंने यह भी माना कि जब वे जांच करने स्कूल पहुंचे तो उन्होंने खुद बच्चों को लाइब्रेरी में बैठे हुए पाया। डीएम ने जांच की रिपोर्ट शिक्षा विभाग को भेज दी है। उम्मीद करते हैं कि दिल्ली की बीजेपी सरकार इस स्कूल के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करते हुए एक उदाहरण सेट करेगी ताकि भविष्य में कोई भी स्कूल इस तरह की हरकत करने के बारे में सोच भी नहीं सके।

इसे भी पढ़ें :  शुक्रवार से धरने पर क्यों बैठे हुए हैं पुडुचेरी के मुख्यमंत्री वी. नारायणसामी ?

दिल्ली के कई प्राइवेट स्कूलों के बाहर मनमानी फीस बढ़ोतरी के खिलाफ अभिवावक प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।वहीं वसंतकुंज स्थित एक प्राइवेट स्कूल ने तो अभिभावकों के स्कूल परिसर में आने पर प्रतिबंध तक लगा दिया है। सही मायनों में कहा जाए तो यह स्कूलों की तानाशाही है और इस देश की सरकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कई तरह के सवाल खड़े करती है।

https://www.facebook.com/share/p/1633A9sKNJ/

देश की राजधानी दिल्ली में 1700 के लगभग प्राइवेट स्कूल हैं। इनमें सरकारी जमीन पर बने प्राइवेट स्कूल 448 हैं। सरकार द्वारा बनाए गए नियम के हिसाब से सभी स्कूलों को हर साल फाइनेंशियल स्टेटमेंट देना जरूरी होता है। अगर शिक्षा निदेशालय को फीस बढ़ोतरी गलत लगती है, तो वो इसे रोक सकती है और स्कूल को बढ़ी हुई फीस अभिवावकों को वापस देनी होगी।

लेकिन सरकार चुप है, अधिकारी अपना काम नहीं कर रहे हैं और इसका नतीजा स्कूलों की मनमानी के रूप में सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि दिल्ली के कई प्राइवेट स्कूलों ने 10 प्रतिशत से लेकर 30 प्रतिशत तक फीस बढ़ा दी है। ये स्कूल ट्यूशन फीस, डिवेलपमेंट फीस, ट्रांसपोर्ट फीस के अलावा ओरिएंटेशन फीस, एसी, स्कूल ऐप और स्मार्ट क्लास के नाम पर भी तगड़ी वसूली कर रहे हैं।

दिल्ली की बीजेपी सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती से कम नहीं है। क्योंकि उनकी सरकार बनने के बाद शुरू हुए स्कूलों के नए सत्र में ही यह फीस बढ़ोतरी की गई है। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर दिल्ली के लोगों को यह लगने लगा है कि भाजपा की सरकार बनने के बाद ही दिल्ली के प्राइवेट स्कूलों के मालिकों में मनमानी करने की हिम्मत आ गई है। यह बात अगर दिल्लीवासियों के मन में बैठ गई तो फिर बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी हो जाएगी। आम आदमी पार्टी इसे एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश लगातार कर रही है। समय की यह मांग है कि सरकार आगे आए और इन प्राइवेट स्कूलों की दादागिरी, मनमानी और तानाशाही भरे रवैए पर रोक लगाए या फिर कड़ी कार्रवाई करें। हालांकि यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि प्राइवेट स्कूलों की यह मनमानी किसी एक शहर या किसी एक राज्य तक ही सीमित भर नहीं है।

इसे भी पढ़ें :  क्या अरविंद केजरीवाल को चुनाव हराया जा सकता है ?

( लेखक- संतोष कुमार पाठक, वरिष्ठ पत्रकार, स्तम्भकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं। ये पिछले 20 वर्षों से दिल्ली में राजनीतिक पत्रकारिता कर रहे हैं। )